ज्यों धरती के अंतस् की हुलस
आकाश को रंगने
मचल उठी अनिवार
अपनी केशरिया पिचकारी से
रंग दिया पूरा आकाश
दूर से मत देखो
देखो टेसू की ज़द से
आकाश की असीमता कैसे
एक पेड़ में उतरती है
जब फागुन अपनी सीमा को देता है विस्तार ।
1-3-15 9:04 pm
मन के भाव शब्दों में ढलकर जब काव्य रूप में परिणित होकर लेखन की भूमि पर बोये जाते है, तो अंकुरित हरितिमा सबको मुकुलित करती है! स्वागत है आपका इस काव्य भूमि पर.....।
मुझे मालूम है
मृत्यु जीवन का
अनिवार्य
और
अंतिम सत्य है/
फिर भी
मृत्यु के विरूद्ध
जीवन
कितने षड़यंत्र करता है?
मुझमें भी
अमरत्व की भूख
इतनी बढ़ चुकी है कि
मरना भूल चुका हूँ/
अमरता भूख है
और मौत भय/
(भय को भुलाना
भी षड़यंत्र है)
भय को भूलना
जरूरी है,
संभवत:
जीवन की मजबूरी/
इस तरह
भय और भूख
के बीच
जीवन
'रोप-वे'/
दि.12-10-14
मैं जनतंत्र का 'जन'
तंत्र से जुदा
सुनता हूँ
गणतंत्र चार स्तंभों पर खड़ा है
मैं देखता हूँ ।
पर मुझे बताया गया है
ये चार स्तंभ हाथी के पांव जैसे है।
इन चार स्तंभों को स्वीकार करने के लिये
मुझे अंधा होना चाहिये।
े
यदि मैंने देखे
इस गणतंत्र के पैरों को
'चौपाये' की तरह
तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का
बेज़ा इस्तेमाल होगा!
देश में कानून का राज है
राष्ट्र की सुरक्षा
राष्ट्रवासियों से ऊपर है!
यदि 'चौपाये' के पैरों को
मैंने कहा 'लंगड़ा'
तो इसे सिद्ध करने की जिम्मेदारी
संविधान ने मुझ पर सौंपी है
यह चौपाया जिसे चलाने के चक्कर नें
'नाल' ठुकवाई गई है
ताकि चौपाये का लंगड़ापन
लील जाए 'नाल'
पर नाल है कि
पैर से उखड़ कर दूसरे पैर को
घायल कर रही है
गणतंत्र को लंगड़ाना है
मैं आश्वस्त हूँ
कि मैं इस चौपाये की खींची
गाड़ी में बैठा हूँ
ये कहीं पहुँचे
न पहुँचे
सूत्रधार
इस मर्म को जानता है
कि मंच पर चौपाये को चलाने का
तरीका यह भी है कि-
नैपथ्य की यवनिका को पीछे की तरफ
खींचा जाए
गणतंत्र आगे
चलता हुआ महसूस होगा।
01-10-14
पाँच सहस्त्राब्दियाँ बीती
विरहिणी क्रौंची को
विरहाकुल आलाप करते
आखिर कब तक
बाँधे रखेंगे
उसे जड़ता में?
कब निकलेगी गहन कुहेलिका से?
सदियों के विस्तार ने
अपने मानक बदल लिये है/
आस्थाएं बदली है/
देवता बदल लियेे है/
फिर क्रौंची की मर्मान्तक कराह
कराल काल की राह पर
क्यों न खोज पाई
अपना दूसरा प्रेम?
क्यों उसके पाषाण हृदय से
फूट न पाया प्रेम का निर्झर?
आओ हम क्रौंची की कराह को सराहें नहीं/
सान्त्वना दें/
बंधन खोलें उसके
फिर से आकाश में उड़ने का/
सोचें
निषाद के हाथों वध हो गया होता
यदि क्रौंची का!
तो कितने दिन एकाकी विचरता क्रौच?
क्या वह नैन मटक्का नहीं करता?
आखिर हमारी सभी वर्जनाएँ मादा पर हीं
क्यों लागू होती है?
आखिर क्यों?
29-09-14
छोटा आदमी
हाड़ तोड़कर
अपने पसीने से पैसा बनाता है!
बड़ा आदमी पैसा नहीं बनाता
पैसा बड़ा आदमी बनाता है
छोटा आदमी
पैसा बनाने में
छोटा हीं रह जाता है!
कौंन बुनता होगा सपने?
मैं उस सपनों के विधाता से मिलना चाहता हूँ /
कैसा होगा वह सपनों का आर्किटेक्ट?
जो संसार को सपने देकर खुद जाग रहा है—
तुममें, हममें, सबमें/
क्या सपने नियति है या नियति स्वप्न है?
सोचता हूँ /
पर अच्छा होगा
उस सपनों के देवता को जागनें दूँ और खुद सो जाऊं
एक सपना जीने के लिये/
एक सपना पूर्ण होता है अपने आप में एक जीवन की तरह/
हम एक जीवन जाएँ या एक सपना, बराबर है!
21 वीं सदी के भौतिकतावादी समय के
नवहस्ताक्षर
भौतिकता के पुनर्जागरण काल के
उन्नायक
नहीं समझते कि
दुनिया के पार भी एक दुनिया हैं, मेले हैं/
'वे'
सब चार्वाक के चेले है/
—" जो है, यहीं है; यहाँ नहीं वह कहीं नहीं" के सूत्र के सूत्रधार
जीवन को क्षणभंगुर मानकर
करते हैं व्यवहार /
'डिनर' की टेबल पर
जीवन की नश्वरता पर
करते हैं चर्चा
पर टेबल की प्लेट में रखा.....
उस मुर्गे से ज्यादा क्षणभंगुरता का मतलब कौन समझता है?
इस क्षणभंगुरता में इतवार के मानी
अलग नहीं होते?
खुद से पूछता हूँ /