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Wednesday, 10 September 2014

उधार नींद—गजेंद्र पाटीदार

माँ
आज मेरा मन तुम्हारे साथ उठकर
तुम्हारी तरह
कोल्हू का बैल बनकर
जुतने का नहीं है/
नहीं करूंगी चूल्हा,
चौका और बर्तन घिसने का काम
कपड़े, लत्ते
गाय का दूध
बैलों की चिन्ता
चारा, पानी सब कुछ
आखिर सदियों से
तुमने इन सबमें
मुझे झोका है मां/
आज देर तक सोऊंगी
भैया की तरह
अपने घर विदा होने से पहले
तेरे आँचल में
मैं सुकून से सो लेना चाहती हूं/
मेरे हिस्से का सपना
छोड़कर
जाना नहीं चाहती/
जीवन के कड़वे यथार्थ
का सामना करने से पहले
अपने हिस्से की नींद
लेकर जाना चाहती हूँ /
वरना सदियों की नींद जो तुम्हारे पास
पेटी में बंद है
किसी गुड़िया की तरह
या मुझ नवजात के कपड़े
बित्ते भर के/
रह हीं जाएँगे तेरे पास
फिर अनंत काल के लिए ।
          ——10,09,2014