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Wednesday, 17 September 2014

बाघ गुफाएँ —गजेंद्र पाटीदार

बाघ की गुफाएँ
इतिहास की मूक गवाह सी/
विन्ध्य मेखला की उपत्यका में
जैसे करूणा द्रवित हो
बहाती हो अश्रु
अपने सहस्त्र चक्षुओं से/
गुफाओं में विराजित
महाबोधि के मुख पर
अलौकिक शान्ति
मिट चुकी जैसे समूची भ्रांति,
'बुद्धम् शरणम्' का उद्घोष
संघनित होकर विलेपित हो गया हो
कंदराओं की भित्तियों पर/
सम्मुख बहती
शांत होकर व्याघ्र सी चपला
'बाघनी' सरिता
शताब्दियों से सम्यक बोध का
कालजयी कलकल निनाद करती सी/
बोधिसत्वों के स्खलित
मौन-मूक विग्रहों से उठती ध्वनि
बुद्ध के पथ का
सहस्त्राब्दियों के पार
कर रही विस्तार
आज भी अक्षुण्ण, अप्रमेय /
इतिहास के मौन साक्षी
गुफा के भित्ति चित्र
देश,काल और स्थिति के
कितने विषम विस्तार को समेटे है/

कल कल - गजेंद्र पाटीदार


आदमी
कल और कल
के बीच
उम्मीदें बोता है।
और असफलताएँ
       ढोता है।

बर्फ की मानिंद
उसका वर्तमान
पिघल पिघल कर
कल कल
          बहता प्रतीत होता है।
कल कल बहता
          अतीत होता है। 
                             09,04,1998