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Monday, 29 December 2014

घास

घास
घास जानवर के लिये
भोजन का जरिया है।

आदमी के लिये
टहलने का
भोजन पचाने का
क्षणभर ठहर कर सुकून का।

किसान के लिये
आफत है
जो चौपट कर देती है फसल
बिकवा देती है खेत
इसलिये निरंतर उसके
विरूद्ध युद्ध जारी है किसान का।

इस तरह जानवर, आदमी और किसान
को
अलग करती है घास
किसी को भोजन
किसी को विचरण
किसी के लिये मरण का जरिया बन।

पर कुछ और भी है जिनके लिये
सब कुछ है
जैसे कीट - पतंगे,
जिनके लिए
जनम, भोजन, विचरण और मरण
सब कुछ

मगर धरती की सोचो
घास धरती के लिये
उर्वरता है! 

पेशावर का दर्द

जब भी मैं पेशावर से बेसलान की दूरी
नापने की कोशिश करता हूँ
फर्लांग और मीलों में/
वह अपने आप 'कन्वर्ट' हो जाती है
महिनों और वर्षों में/
मेरी हर कोशिश नाकाम साबित होती है।
मैं भूगोल नापना चाहता हूँ
और इतिहास नप जाता है/
इतिहास की एक
हरामी ज़िद
अपनी ज़द में घेर लेती है
समूचा युग!
इस ज़द की बढ़ती कालिख
वर्तमान को लील जाती है,
किसी खामोश अजगर की तरह/
मालूम पड़ता है तब
जब
अजगर
निगल चुका होने के बाद
मरे हुए समय को पचाने के लिये
तड़ तड़ चटकाता है हड्डियाँ /
पेशावर और बेसलान की तरह।

विदेह जीवन

देखता हूं रक्त में प्रवाह
समय से आगे
जैसे
ठहर गया हो समय
और
रक्त धमनी और शिराओं की सीमा
लांघ कर
बहना चाहता है
उन्मुक्त/
रक्त का अवरोध जीवन है?
या रक्त से विरक्त
होकर बह निकलना
होना विदेह
या दुनिया से विरत!
जीवन की सीमाओं से परे
देह और रक्त के संबंधों से विलग
जीवन है निस्सीम!13-12-2014

यज़ीद

नानी की कहानियों में
सुनते थे
चुड़ैलें भी गर्भवती महिलाओं को
मारती नहीं/
भावी माँ का करतीं है सम्मान ।
हत्यारिनें भी जान नहीं लेतीं
यदि जान लेती है कि उसकी शिकार
'दोजीवी' है।
हत्या में शिष्टाचार
लगता है
मिथक और कहानियों की बातें
हो चुकी है।
डेढ़सौ निरीह महिलाओं का निर्मम वध
सुनकर
रूह तो काँपती हीं है
पर
लगता है
कि यज़ीद और यज़ीदियों ने
शब्द नहीं बदले,
अर्थ बदल लिये है
बदलते दौर में।
20-12-2014

Friday, 26 December 2014

घास

घास
घास जानवर के लिये
भोजन का जरिया है।

आदमी के लिये
टहलने का
भोजन पचाने का
क्षणभर ठहर कर सुकून का।

किसान के लिये
आफत है
जो चौपट कर देती है फसल
बिकवा देती है खेत
इसलिये निरंतर उसके
विरूद्ध युद्ध जारी है किसान का।

इस तरह जानवर, आदमी और किसान
को
अलग करती है घास
किसी को भोजन
किसी को विचरण
किसी के लिये मरण का जरिया बन।

पर कुछ और भी है जिनके लिये
सब कुछ है
जैसे कीट - पतंगे,
जिनके लिए
जनम, भोजन, विचरण और मरण
सब कुछ

मगर धरती की सोचो
घास धरती के लिये
उर्वरता है
सतत लड़कर मरूथल के साथ

घास हीं जीवन का क्रम सिरजती है।

Sunday, 12 October 2014

रोप-वे—गजेंद्र पाटीदार

मुझे मालूम है
मृत्यु जीवन का
अनिवार्य
और
अंतिम सत्य है/
फिर भी
मृत्यु के विरूद्ध
जीवन
कितने षड़यंत्र करता है?
मुझमें भी
अमरत्व की भूख
इतनी बढ़ चुकी है कि
मरना भूल चुका हूँ/
अमरता भूख है
और मौत भय/
(भय को भुलाना
भी षड़यंत्र है)
भय को भूलना
जरूरी है,
संभवत:
जीवन की मजबूरी/
इस तरह
भय और भूख
के बीच
जीवन
'रोप-वे'/
                      दि.12-10-14

Thursday, 2 October 2014

मेरा गणतंत्र— गजेंद्र पाटीदार

मैं जनतंत्र का 'जन'
तंत्र से जुदा
सुनता हूँ
गणतंत्र चार स्तंभों पर खड़ा है
मैं देखता हूँ ।

पर मुझे बताया गया है
ये चार स्तंभ हाथी के पांव जैसे है।
इन चार स्तंभों को स्वीकार करने के लिये
मुझे अंधा होना चाहिये।

यदि मैंने देखे
इस गणतंत्र के पैरों को
'चौपाये' की तरह
तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का
बेज़ा इस्तेमाल होगा!

देश में कानून का राज है
राष्ट्र की सुरक्षा
राष्ट्रवासियों से ऊपर है!

यदि 'चौपाये' के पैरों को
मैंने कहा 'लंगड़ा'
तो इसे सिद्ध करने की जिम्मेदारी
संविधान ने मुझ पर सौंपी है

यह चौपाया जिसे चलाने के चक्कर नें
'नाल' ठुकवाई गई है
ताकि चौपाये का लंगड़ापन
लील जाए 'नाल'

पर नाल है कि
पैर से उखड़ कर दूसरे पैर को
घायल कर रही है
गणतंत्र को लंगड़ाना है

मैं आश्वस्त हूँ
कि मैं इस चौपाये की खींची
गाड़ी में बैठा हूँ
ये कहीं पहुँचे
न पहुँचे

सूत्रधार
इस मर्म को जानता है
कि मंच पर चौपाये को चलाने का
तरीका यह भी है कि-
नैपथ्य की यवनिका को पीछे की तरफ
खींचा जाए
गणतंत्र आगे
चलता हुआ महसूस होगा।
                                       01-10-14

Monday, 29 September 2014

दूसरा प्यार— गजेंद्र पाटीदार


पाँच सहस्त्राब्दियाँ बीती
विरहिणी क्रौंची को
विरहाकुल आलाप करते

आखिर कब तक
बाँधे रखेंगे
उसे जड़ता में?

कब निकलेगी गहन कुहेलिका से?

सदियों के विस्तार ने
अपने मानक बदल लिये है/
आस्थाएं बदली है/
देवता बदल लियेे है/

फिर क्रौंची की मर्मान्तक कराह
कराल काल की राह पर
क्यों न खोज पाई
अपना दूसरा प्रेम?

क्यों उसके पाषाण हृदय से
फूट न पाया प्रेम का निर्झर?

आओ हम क्रौंची की कराह को सराहें नहीं/
सान्त्वना दें/

बंधन खोलें उसके
फिर से आकाश में उड़ने का/

सोचें
निषाद के हाथों वध हो गया होता
यदि क्रौंची का!

तो कितने दिन एकाकी विचरता क्रौच?
क्या वह नैन मटक्का नहीं करता?

आखिर हमारी सभी वर्जनाएँ मादा पर हीं
क्यों लागू होती है?
आखिर क्यों?
                     29-09-14

Friday, 26 September 2014

पैसा—गजेंद्र पाटीदार

छोटा आदमी
हाड़ तोड़कर
अपने पसीने से पैसा बनाता है!

बड़ा आदमी पैसा नहीं बनाता
पैसा बड़ा आदमी बनाता है

छोटा आदमी
पैसा बनाने में
छोटा हीं रह जाता है!

Tuesday, 23 September 2014

सपने - गजेंद्र पाटीदार

कौंन बुनता होगा सपने?
मैं उस सपनों के विधाता से मिलना चाहता हूँ /
कैसा होगा वह सपनों का आर्किटेक्ट?
जो संसार को सपने देकर खुद जाग रहा है—
तुममें, हममें, सबमें/
क्या सपने नियति है या नियति स्वप्न है?
सोचता हूँ /
पर अच्छा होगा
उस सपनों के देवता को जागनें दूँ और खुद सो जाऊं
एक सपना जीने के लिये/
एक सपना पूर्ण होता है अपने आप में एक जीवन की तरह/
हम एक जीवन जाएँ या एक सपना, बराबर है!

क्षणभंगुरता - गजेंद्र पाटीदार

21 वीं सदी के भौतिकतावादी समय के
नवहस्ताक्षर
भौतिकता के पुनर्जागरण काल के
उन्नायक
नहीं समझते कि
दुनिया के पार भी एक दुनिया हैं, मेले हैं/
'वे'
सब चार्वाक के चेले है/
—" जो है, यहीं है; यहाँ नहीं वह कहीं नहीं" के सूत्र के सूत्रधार
जीवन को क्षणभंगुर मानकर
करते हैं व्यवहार /
'डिनर' की टेबल पर
जीवन की नश्वरता पर
करते हैं चर्चा
पर टेबल की प्लेट में रखा.....
उस मुर्गे से ज्यादा क्षणभंगुरता का मतलब कौन समझता है?
इस क्षणभंगुरता में इतवार के मानी
अलग नहीं होते?
खुद से पूछता हूँ /

Saturday, 20 September 2014

तंत्र का छल—गजेंद्र पाटीदार

अपने आप को गरीब साबित करने की
होड़ देखना हो तो
राशन की दुकान पर देखिये/
'लोक' को 'तंत्र' खुद
छला जाना सिखा रहा है/
राशन की दुकान पर कतार में
लगा आदमी अमीर नहीं गरीब होना चाहता है/
राशन की दुकान
देवों का अक्षय पात्र है या मानवता की देह पर पनपी कोढ़ है/
खुद से पूछता हूं?
अन्न उपजाता किसान
और भूखा आदमी सिक्के के दो पहलू है/
और लोकतंत्र का सिक्का खनखना रहा है/

Wednesday, 17 September 2014

बाघ गुफाएँ —गजेंद्र पाटीदार

बाघ की गुफाएँ
इतिहास की मूक गवाह सी/
विन्ध्य मेखला की उपत्यका में
जैसे करूणा द्रवित हो
बहाती हो अश्रु
अपने सहस्त्र चक्षुओं से/
गुफाओं में विराजित
महाबोधि के मुख पर
अलौकिक शान्ति
मिट चुकी जैसे समूची भ्रांति,
'बुद्धम् शरणम्' का उद्घोष
संघनित होकर विलेपित हो गया हो
कंदराओं की भित्तियों पर/
सम्मुख बहती
शांत होकर व्याघ्र सी चपला
'बाघनी' सरिता
शताब्दियों से सम्यक बोध का
कालजयी कलकल निनाद करती सी/
बोधिसत्वों के स्खलित
मौन-मूक विग्रहों से उठती ध्वनि
बुद्ध के पथ का
सहस्त्राब्दियों के पार
कर रही विस्तार
आज भी अक्षुण्ण, अप्रमेय /
इतिहास के मौन साक्षी
गुफा के भित्ति चित्र
देश,काल और स्थिति के
कितने विषम विस्तार को समेटे है/

कल कल - गजेंद्र पाटीदार


आदमी
कल और कल
के बीच
उम्मीदें बोता है।
और असफलताएँ
       ढोता है।

बर्फ की मानिंद
उसका वर्तमान
पिघल पिघल कर
कल कल
          बहता प्रतीत होता है।
कल कल बहता
          अतीत होता है। 
                             09,04,1998

Saturday, 13 September 2014

ईश्वर —गजेंद्र पाटीदार

मेरे चीथड़ोंसे
चूते पसीने की
गंध तुम सह नहीँ पाओगे
कीचड़ से सने
पैर
कईं  सफेदियों पर ग्रहण लगा देंगे। इसलिए तुम
मेरे पास मत आओ
मुझे रहने दो
असुविधा के इस रौरव मेँ
रहने दो कुभीपाक में अभी
क्योंकि
तुमने अंबेडकर को भी
कोट ओर पतलून पहनाकर
मेरी जात से छीन लिया है/
अब मैं नहीँ आना चाहता
तुम्हारे साथ
क्योंकि
मुझे पता है, तुम्हारे साथ जो गया/
वह बदजात हो जाता है/
राजधानियों की रंगीनियों मेँ डूबकर
वह केवल सपनों का सौदागर हो जाता है इसलिए मैं
सबको ठुकराता हूँ/
नकारता हूं सबको/
कि मेरी पीड़ा को भी तुम/
अपने विज्ञापन के अवसर के रुप मेँ लेकर/
बस मेरा मजाक उड़ाओगे/
मैं तपूंगा और/
इस नरक की आग मेँ/
अब न छला जाऊंगा तुम्हारे ईश्वर से भी/ क्योंकि जिसे
जिसे मैंने अपना कहा/
चालाक तुम लोगों ने/
उसे ईश्वर बनाकर पूज दिया/
बैठा दिया गर्भगृह मेँ कैद करके/
मंत्रों की आवृत्तियों के जाल में उलझा तुम्हारा ईश्वर भी/
मेरी हाय से बच न सकेगा/
मेरी सड़ांध भरी जिंदगी को जब तक तुम्हारा ईश्वर न सीकारेगा/
बच नहीँ सकता/
यह सब होगा/
अगली क्रांति की सुबह/
............29,08,2014

टिटहरी की चीख - गजेंद्र पाटीदार

टिटहरी
जेठ की भीषण
दुपहरी में

कंकड़ों, पत्थरों का
कोटर बनाकर
देती है अंडे

छुपा देती है उन्हे
उन्हीं कंकड़ों के बीच
अंडाखोरों से सुरक्षा के लिये/

टिटहरी भी धरती पर
दिखती कहाँ है प्रकृति की विशालता में?

उसके अंडों की ओर
उठते कदमों के विरूद्ध चीख का नाम
हीं तो है
टिटहरी /
        13-09-14

लोकतंत्र और बहसें

शाम के छ: बजने वाले है/
आज का ज्वलंत मुद्दा
"................."
टीवी पर पैनलिस्टों का होगा
घमासान
फिक्सिंग में सेट कुछ
अखबारी बिरादर भी
फिक्स हैं/
किस दल से कौन?
क्या बोलेगा?
पता है।
अलबत्ता पता होना चाहिये—
कौन किस दल में है?
टीवी के प्यालिया तूफानों से हम
अमूमन वाकिफ होते है
मगर फिर भी
हम बैठते हैं शाम के छ: बजे/
टीवी के आगे /
इस तरह रोजमर्रा से
जूझकर भी
हम तटस्थ रहते है, 
लोकतंत्र के
पक्के और सच्चे वोटर की तरह/
आखिर हम लोकतंत्र के
पहरेदार भी तो है/
           13-09-14

Wednesday, 10 September 2014

उधार नींद—गजेंद्र पाटीदार

माँ
आज मेरा मन तुम्हारे साथ उठकर
तुम्हारी तरह
कोल्हू का बैल बनकर
जुतने का नहीं है/
नहीं करूंगी चूल्हा,
चौका और बर्तन घिसने का काम
कपड़े, लत्ते
गाय का दूध
बैलों की चिन्ता
चारा, पानी सब कुछ
आखिर सदियों से
तुमने इन सबमें
मुझे झोका है मां/
आज देर तक सोऊंगी
भैया की तरह
अपने घर विदा होने से पहले
तेरे आँचल में
मैं सुकून से सो लेना चाहती हूं/
मेरे हिस्से का सपना
छोड़कर
जाना नहीं चाहती/
जीवन के कड़वे यथार्थ
का सामना करने से पहले
अपने हिस्से की नींद
लेकर जाना चाहती हूँ /
वरना सदियों की नींद जो तुम्हारे पास
पेटी में बंद है
किसी गुड़िया की तरह
या मुझ नवजात के कपड़े
बित्ते भर के/
रह हीं जाएँगे तेरे पास
फिर अनंत काल के लिए ।
          ——10,09,2014

Monday, 8 September 2014

अर्थसंकोच - गजेंद्र पाटीदार

एक ने कहा 'राम'
दूसरे ने 'मंदिर' समझा
कबीर! बपुरा!!
ढाई आखर के फेर में
क्या करता?
—'टीका'

जब शब्द और अर्थ
मृत्यु शय्या पर
तड़पते हों,

जब 'संप्रदाय' शब्द में
सड़े गले मुर्दे की
गंध महसूसने लगे

तब मानना होगा
लोगों की घ्राण शक्ति
शब्दों की उपज है/

महाबोधि —गजेंद्र पाटीदार

महाबोधि
पोखरण के पोखर का आचमन स्वीकारो
सचराचर विश्व तुम्हारा है,
किसे कहूं मेरा,
विश्व, देश, सागर,
मरूथल, पठार, 
नदियाँ,  झील, पोखर,
सब कुछ
भूमिज धान्य भी, यूरेनियम भी,
संलयन, विलयन भी/
जीवन तुम्हारा
प्रलय भी तुम्हें समर्पित /
यदि सृजनहित,
इस सृष्टि में;
कुछ दखल हो तो—
यह सब अस्मिता के लिये/
कुछ तैमूर, चंगेज
यदि रौंदे भू को, भारती को, भविष्यत् को,
तो/ हम उत्तर देंगें/
हमेशा की तरह/
                (बुद्ध पूर्णिमा 11मई1998 के पोखरण विस्फोट पर)     ...12,05,1998