दूसरे ने 'मंदिर' समझा
कबीर! बपुरा!!
ढाई आखर के फेर में
क्या करता?
—'टीका'
जब शब्द और अर्थ
मृत्यु शय्या पर
तड़पते हों,
जब 'संप्रदाय' शब्द में
सड़े गले मुर्दे की
गंध महसूसने लगे
तब मानना होगा
लोगों की घ्राण शक्ति
शब्दों की उपज है/
मन के भाव शब्दों में ढलकर जब काव्य रूप में परिणित होकर लेखन की भूमि पर बोये जाते है, तो अंकुरित हरितिमा सबको मुकुलित करती है! स्वागत है आपका इस काव्य भूमि पर.....।
एक ऐसे समय में
जबकि मानव के मन में
बैठा है संत्रास,
भय और भूख
हर तरफ हाहाकार/
सूरज खुद अँधेरे को
उगलने का स्रोत हो
किससे करें स्तोत्र रचकर
जगाने की कल्पना/
औरों में नायक की तलाश
संक्रमित समय में
शिखंडी और शकुनि के चरित्र
संक्रमण करे एक दूजे का
और पैदा करने लगे
हर तरफ अविश्वास, छल
और पद का व्यामोह/
पैदा करें
क्रांति की
यज्ञशाला में अवतारी रूद्र
जो ध्वंस करे समस्याओं का/
लेकिन हवनकुंड भी
उगले क्षुद्र स्वार्थों के
पिशाच
तो फिर
हे कवि,
न डिगे धैर्य
न चुके विश्वास
न रूके व्रत
न झुके प्रण
छोड़ सूरज शिखंडी और शकुनि को
लिख ऋचा सम कविता
कर आवाहन मंत्र सम भावों का
कि जिससे
और कहीं नहीं
खुद अपने अंदर
जागे
तंद्रा में सोयी
मानवता
हो अभ्युदय देवत्व का
किसी बड़ी क्रांति का/
विश्वास चुक गया हो
तो हर मन के अंदर
एक बड़ी क्रांति का
आवाहन संभाव्य है/
कर्म
कई बड़े रूढ़ धर्मो को
दिशा देगा/
अर्थ बदल जाएँगे
उन श्लोकों की आवृतियों के
कि —
हर मन पर
जन की विजय का
होगा शंखनाद
गण करेगा
विश्वास के सेतु का निर्माण
आओ कवि
गाएँ गीता
कि हम खुद अपने
प्रति विश्वास का माहौल तैयार करें
कर्म साथ हो
लगन विश्व निष्ठा की
एक दूध मुंही बेटी
सुरक्षित हो
एक पेड़ हमारे सामने
न कटे
तो बिखरी पत्तियाँ भी
राह का श्रंगार होंगी/
एक नदी हमसे सहमें ना/
अपनी धरती पर
ओबामा और ओसामा की
थूकने की कोशिश को
हम विफल करेंगें/
03-09-2014
इतिहास
विजेता की विजयाभिलाषा का
प्रशस्तिगान हैै /
विरूदावली फेफड़ों को देती है,
जीने की ताकत
इतिहास को/
यह नहीं है हारे हुए लोगों की चित्कार का करूण क्रंदन/
या कि कब्रों से वंचित
लथपथ शवों पर विदा गीत/
इतिहास की आँख
केवल
अर्जुन की तरह चिड़ियाँ की
आँख देखती है
नहीं देखता
इतिहास
काल की गणना/
वह काल को केवल
सीढ़ी समझता है
जो चढ़नेे नहीं
उतरने के काम आती है
जो तहखानों की ओर ले जाती है
अँधेरी घुप्प गुफा/
इतिहास
मशाल का नहीं
अब तो दीये का काम भी
नहीं करता/
और इतिहासकार
छाती पीटने वाली किराये की
रूदालियां
अलग अलग गांवों/ खेमों की।
02:09:2014
सफेद पोश बगुला
यदि मछलियाँ खाता है
तो सिस्टम है
लेकिन
मछलियां क्रांति कर दे
अपनी आत्मरक्षा के लिये
तो
बगुले की भूख के विरूद्ध यह
षड़यंत्र है।
इसलिये
नभचरों के हित में
सेक्युलर स्थलचरों की
जलचरों के विरूद्ध
आवाज है
जहाँगीरी घंटा तैयार है
बजने के लिये/
तैयार हो जाओ ओ शासक
तख्ता पलट कभी भी
हो सकता है।
संविधान में प्रदत्त
भोजन का अधिकार नभचरों पर
(हीं) लागू है!
03:09:2014
नदी होना कितना
दुष्कर है/
चट्टानों की छाती चीर
निकलना/
हिम की जड़ता से बिलग हो
चल पड़ना/
झेलना गहन वन प्रांतर
का सूनापन/
भरना उनमें
अपना कलकल नाद/
पहाड़ों, खाइयों, वृक्षों -बीहड़ों की
जड़ता के विरूद्ध/
चलना अथक चलना
गुनगुनाना एकांत एकालाप/
स्वीकारना सबके
मल, मैल और पाप/
पावन करना सबको
झेलकर खुद अभिशाप/
करना प्रतिक्रमण
बिना ठहरे
सिरजना रेत
नये निर्माण का बीज
और महामिलन
अपना सब कुछ
अस्तित्व और अनस्तित्व का
चरम
सौंपकर सागर को/
दुष्कर है/
गंगोत्री का पथ/
—
नारी होना कितना
दुष्कर है/
गंगोत्री के पथ पर/
पहाड़ों का बोझ उठाना
अपने नन्हें कंधों पर
लकड़ी का गट्ठर हो
या घास का बोझा
सब नारी के कंधों पर
सवार होकर
हीं
संस्कृति को सँवारते हैं/
पहाड़ों का नीरव सूनापन
अंतस की उर्मियों का
करूण क्रंदन/
उसके पुरखों सरीखे
चीड़ और देवदारू भी
रहकर मौन
दुलारते हैं/
पानी और जवानी
की उर्वरता
लुटाकर पहाड़ी नारी
मैदानों को/
खुद कितनी अनुर्वरता
का अभिशाप लेकर
जीती है, गढ़वाली पहाड़ों की गहराइयों में/
अस्तित्व और अनस्तित्व का चरम
सौंपकर संसार को/
दुष्कर है
नारी का पथ/
गंगोत्री के पथ पर/
दि. 02:09:2014
ईजराइल की तोपों की
दहाड़ से पैदा मौतों के
रक्तबीज
अखबार के पन्नों
और टीवी स्क्रीन के
माध्यम से
मेरे घर तक पहुँचकर
डरा रहे है मेरी कोमल भावनाओं को/
इराक की नृशंसता भी
वैसे हीं
और उतने हीं
रक्तबीज पैदा करती है/
आहत करती है सभी
मानवता के पक्षधरों को/
लेकिन कुछ पक्षधरों की चीख
कभी तो
आसमान उठा लेती है/
और कभी मिमीया जाती है
बली में कटते मेंमने की तरह /
मौतों में फर्क क्यों करते है?
ये थर्ड एम्पायर ।
गाँव की कच्ची सड़क पर
दौड़ते दुपहिया वाहनों
और आवाजाही के बीच
अपने लिए दानें जुटाना
एक गिलहरी के लिए
कितना बड़ा काम है?
कि इसके लिए प्राणों की
आहुति देनी पड़ती है
उस गिलहरी को/
खतरा देखते हीं
नीम की पुरानी खोखर मेँ
विलुप्त हो जाना
उस गिलहरी का/
काश सेतु बांधनें के
अकिंचन कार्य के पुरस्कार में
मिली पीठ की तीन धारियों
की जगह उसनें मांग लिये होते
दो पंख!
बना दिया
बगैेर पंखों का पंछी
उस गिलहरी को/
ऐसा सोचती है गिलहरी
जब कभी नवजात
असुरक्षित हो/
और कभी
दौड़ती कच्ची सड़क के बीच
दाना ढूँढने की कोशिश
जान हीं ले ले/
तो नीम की खोखर मेँ
क्या करेंगें नवजात?
सोचती है गिलहरी /
इसीलिए दौड़ती सड़क की दुर्घटना में
मर कर भी एक सोच
दे जाती है
गिलहरी
नन्हीं परी सी/
11,08,2014
क्या कभी हमने सुनें है,
शब्द मंत्रों के/
क्या कभी उन अर्थ को गहरे निबाहा?
ले पुष्प हाथों में खड़े हो पंक्ति बद्ध,
हमने बस भावनाओं को अर्पित किया/
उन चरणों में जो
स्रोत है मंत्रों का/
जो हमें देता है शब्द
अर्थ
और करता है सार्थक/
हमारा मंत्रोच्चार हमें खुद गढ़ता है/
हम नहीं रचते मंत्रों को,
मंत्र हमें रचते है/
कोटेश्वर
यहीं है मेरा दशाश्वमेध,
यहीं है मेरा मणिकर्णिका,
यहीं पर आना है मुझे,
किन्हीं काँधों पर चढ़कर
कोटेश्वर
नर्मदा का तट
प्रातः नित्य
मत्स्याखेट को जाते केवट।
नन्हे बच्चे
नर्मदा के,
तैरने की कलाबाजी के साथ
ढूँढते हैं सिक्के नर्मदा में,
चुम्बक बाँधकर रस्सियों में
फेंकते है जल में
खोजने सिक्के नर्मदा से/
तैरती तरणियाँ पार उतारती है,
इस तरह नर्मदा
पीढ़ियों को तारती है,
उन्हें भी जो
जल में आनाभि
उतरकर देते हैं अर्ध्य तरणी को।
और उन्हे भी
जो घाट पर
चीथड़े फैलाकर
अन्न का दान
माँगते याचक।
त्रिकाल मज्जन कर
मुमुक्षु वितरागी
अपनी जटा जल में डुबोकर
फटकारता है
तो नर्मदा
कितने हीं
इंद्रधनुष रचती है
अपने अंक में।
संध्या के सिंदुरी सूर्य के
अस्ताचल में छिपने के बाद
नर्मदा परिक्रमा के
परिव्राजक
नन्हीं घंटियाँ टिनटिनाते हुए
नन्हे दीपों से
'जय जगदानंदी'
गाकर उतारते हैं आरती
सभी दु:ख
सारे क्लेश
नर्मदा हीं टारती।
इस तरह जीवन के कईं परसर्ग
रचती है नर्मदा—
नर्मदा ने,
नर्मदा को,
नर्मदा में,
नर्मदा से,
नर्मदा पर/
जीवन के उपरांतस्वर्ग के भी कई उपसर्ग लिखती है
नर्मदा,
अपने इसी तीर्थ
कोटेश्वर में,
कुमार स्कन्द की तपस्थली
कईं यज्ञों की पुण्यस्थली,
संस्कृति की स्रोतस्विनी की कोख से
जहाँ मानवता फूली और फली।
उरी और बाघनी नदियाँ
करती है संगम
करती है अभिषेक
नर्मदा का,
अपने शंख, सीपियों,और कंकड़ रेत से।
स्वीकारती है सर्व योगक्षेम
नर्मदा
जनम का, जीवन का, मरण का
करती है वरण
उनका भी
जो रण जीत जाते हैं,
और उनका भी
जो रण हार
खुद को न्यौछावर कर देते है।
मैं भी शब्दों को न्यौछावर करता हूँ
अभी
खुद के न्यौछावर होनें तक।
सर्वदा हर्म्यदा पुण्या सर्वत्र नर्मदा को।।
-—-—-—-—-—गजेंद्र पाटीदार
23.07.2014
पाटीदारी बोली के सम्बन्ध में कुछ बातें आज अपने ब्लॉग पर शेयर करना चाहता हूँ। मूलतः पश्चिम निमाड़ के बड़वानी - धार की तहसीलों के 72 ग्रामो के साथ खरगोन जिले के 54 ग्रामों के लेवा पाटीदारों के द्वारा जिस बोली का व्यवहार अपनी मातृभाषा के रूप में किया जाता है ; उसका उल्लेख किसी भी प्रकार से म.प्र. के लिंग्विस्टिक शासकीय/अशासकीय कार्यों में नहीं है. हम पाटीदारों के मुख्य रूप से कृषिजीवी होने एवं अपने अंचल की प्रभुजाति होने के बावजूद ख़ुद हमारा ध्यान इस और नहीं गया है कि अत्याधुनिकता के इस दौर में अपनी दिन-प्रतिदिन घुट घुट कर मरने वाली इस पाटीदारी बोली के बारे में, इसके परिमार्जन के बारे में सोचे.धार, बड़वानी और खरगोन जिलों के कई ग्रामो में बोली जाने वाली यह बोली मध्य-प्रदेश के किसी भी शासकीय उल्लेख में दर्ज नहीं है, क्योकि प्रायः माध्यम के कॉलम में प्रत्येक पाटीदार हिंदी को ही अपनी भाषा के रूप में दर्ज करता है। यही अपनी इस भाषा के साथ अ'मान' की समस्या का मूल है।अब मैं हिंदी , गुजराती एवं पाटीदारी तीनो भाषाओ के वाक्यांशों का अनुवाद प्रस्तुत करता हूँ ------