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Saturday, 6 September 2014

आविर्भाव

एक ऐसे समय में
जबकि मानव के मन में
बैठा  है संत्रास,
भय और भूख
हर तरफ हाहाकार/
सूरज खुद अँधेरे को
उगलने का स्रोत हो
किससे करें स्तोत्र रचकर
जगाने की कल्पना/
औरों में नायक की तलाश
संक्रमित समय में
शिखंडी और शकुनि के चरित्र
संक्रमण करे एक दूजे का
और पैदा करने लगे
हर तरफ अविश्वास, छल
और पद का व्यामोह/
पैदा करें
क्रांति की
यज्ञशाला में अवतारी रूद्र
जो ध्वंस करे समस्याओं का/
लेकिन हवनकुंड भी
उगले क्षुद्र स्वार्थों के
पिशाच
तो फिर
हे कवि,
न डिगे धैर्य
न चुके विश्वास
न रूके व्रत
न झुके प्रण
छोड़ सूरज शिखंडी और शकुनि को
लिख ऋचा सम कविता
कर आवाहन मंत्र सम भावों का
कि जिससे
और कहीं नहीं
खुद अपने अंदर
जागे
तंद्रा में सोयी
मानवता
हो अभ्युदय देवत्व का
किसी बड़ी क्रांति का/
विश्वास चुक गया हो
तो हर मन के अंदर
एक बड़ी क्रांति का
आवाहन संभाव्य है/
कर्म
कई बड़े रूढ़ धर्मो को
दिशा देगा/
अर्थ बदल जाएँगे
उन श्लोकों की आवृतियों के
कि —
हर मन पर
जन की विजय का
होगा शंखनाद
गण करेगा
विश्वास के सेतु का निर्माण
आओ कवि
गाएँ गीता
कि हम खुद अपने
प्रति विश्वास का माहौल तैयार करें
कर्म साथ हो
लगन विश्व निष्ठा की
एक दूध मुंही बेटी
                सुरक्षित हो
एक पेड़ हमारे सामने
न कटे
तो बिखरी पत्तियाँ भी
राह का श्रंगार होंगी/
एक नदी हमसे सहमें ना/
अपनी धरती पर
ओबामा और ओसामा की
थूकने की कोशिश को
हम विफल करेंगें/
                   03-09-2014

Thursday, 4 September 2014

इतिहास

इतिहास
विजेता की विजयाभिलाषा का
प्रशस्तिगान हैै /
विरूदावली  फेफड़ों को देती है,
जीने की ताकत
इतिहास को/
यह नहीं है हारे हुए लोगों की चित्कार का करूण क्रंदन/
या कि कब्रों से वंचित
लथपथ शवों पर विदा गीत/
इतिहास की आँख
केवल
अर्जुन की तरह चिड़ियाँ की
आँख देखती है
नहीं देखता
इतिहास
काल की गणना/
वह काल को केवल
सीढ़ी समझता है
जो चढ़नेे नहीं
उतरने के काम आती है
जो तहखानों की ओर ले जाती है
अँधेरी घुप्प गुफा/

इतिहास
मशाल का नहीं
अब तो दीये का काम भी
नहीं करता/
और इतिहासकार
छाती पीटने वाली किराये की
रूदालियां
अलग अलग गांवों/ खेमों की।
       02:09:2014

Wednesday, 3 September 2014

भोजन का अधिकार

सफेद पोश बगुला
यदि मछलियाँ खाता है
तो सिस्टम है
लेकिन
मछलियां क्रांति कर दे
अपनी आत्मरक्षा के लिये
तो
बगुले की भूख के विरूद्ध यह
षड़यंत्र है।
इसलिये
नभचरों के हित में
सेक्युलर स्थलचरों की
जलचरों के विरूद्ध
आवाज है
जहाँगीरी घंटा तैयार है
बजने के लिये/
तैयार हो जाओ ओ शासक
तख्ता पलट कभी भी
हो सकता है।
संविधान में प्रदत्त
भोजन का अधिकार नभचरों पर
(हीं) लागू है!
            03:09:2014

Tuesday, 2 September 2014

गंगोत्री के पथ पर—गजेंद्र पाटीदार

नदी होना कितना
दुष्कर है/
चट्टानों की छाती चीर
निकलना/
हिम की जड़ता से बिलग हो
चल पड़ना/
झेलना गहन वन प्रांतर
का सूनापन/
भरना उनमें
अपना कलकल नाद/
पहाड़ों, खाइयों,  वृक्षों -बीहड़ों की
जड़ता के विरूद्ध/
चलना अथक चलना
गुनगुनाना एकांत एकालाप/
स्वीकारना सबके
मल, मैल और पाप/
पावन करना सबको
झेलकर खुद अभिशाप/
करना प्रतिक्रमण
बिना ठहरे
सिरजना रेत
नये निर्माण का बीज
और महामिलन
अपना सब कुछ
अस्तित्व और अनस्तित्व का
चरम
सौंपकर सागर को/
दुष्कर है/
गंगोत्री का पथ/
       —
नारी होना कितना
दुष्कर है/
गंगोत्री के पथ पर/
पहाड़ों का बोझ उठाना
अपने नन्हें कंधों पर
लकड़ी का गट्ठर हो
या घास का बोझा
सब नारी के कंधों पर
सवार होकर
हीं
संस्कृति को सँवारते हैं/
पहाड़ों का नीरव सूनापन
अंतस की उर्मियों का
करूण क्रंदन/
उसके पुरखों सरीखे
चीड़ और देवदारू भी
रहकर मौन
दुलारते हैं/
पानी और जवानी
की उर्वरता
लुटाकर पहाड़ी नारी
मैदानों को/
खुद कितनी अनुर्वरता
का अभिशाप लेकर
जीती है, गढ़वाली पहाड़ों की गहराइयों में/
अस्तित्व और अनस्तित्व का चरम
सौंपकर संसार को/
दुष्कर है
नारी का पथ/
गंगोत्री के पथ पर/
                       दि. 02:09:2014

Monday, 1 September 2014

थर्ड एम्पायर


ईजराइल की तोपों की
दहाड़ से पैदा मौतों के
रक्तबीज
अखबार के पन्नों
और टीवी स्क्रीन के
माध्यम से
मेरे घर तक पहुँचकर
डरा रहे है मेरी कोमल भावनाओं को/
इराक की नृशंसता भी
वैसे हीं
और उतने हीं
रक्तबीज पैदा करती है/
आहत करती है सभी
मानवता के पक्षधरों को/
लेकिन कुछ पक्षधरों की चीख
कभी तो
आसमान उठा लेती है/
और कभी मिमीया जाती है
बली में कटते मेंमने की तरह /
मौतों में फर्क क्यों करते है?
ये थर्ड एम्पायर ।

Wednesday, 27 August 2014

गिलहरी

गाँव की कच्ची सड़क पर
दौड़ते दुपहिया वाहनों
और आवाजाही के बीच
अपने लिए दानें जुटाना
एक गिलहरी के लिए
कितना बड़ा काम है?
कि इसके लिए प्राणों की
आहुति देनी पड़ती है
उस गिलहरी को/
खतरा देखते हीं
नीम की पुरानी खोखर मेँ
विलुप्त हो जाना
उस गिलहरी का/
काश सेतु बांधनें के
अकिंचन कार्य के पुरस्कार में
मिली पीठ की तीन धारियों
की जगह उसनें मांग लिये होते
दो पंख!
बना दिया
बगैेर पंखों का पंछी
उस गिलहरी को/
ऐसा सोचती है गिलहरी
जब कभी नवजात
असुरक्षित हो/
और कभी
दौड़ती कच्ची सड़क के बीच
दाना ढूँढने की कोशिश
जान हीं ले ले/
तो नीम की खोखर मेँ
क्या करेंगें नवजात?
सोचती है गिलहरी /
इसीलिए दौड़ती सड़क की दुर्घटना में
मर कर भी एक सोच
दे जाती है
गिलहरी
नन्हीं परी सी/
            11,08,2014

Friday, 9 May 2014

मंत्रोच्चार

क्या कभी हमने सुनें है,
शब्द मंत्रों के/
क्या कभी उन अर्थ को गहरे निबाहा?
ले पुष्प हाथों में खड़े हो पंक्ति बद्ध,
हमने बस भावनाओं को अर्पित किया/
उन चरणों में जो
स्रोत है मंत्रों का/
जो हमें देता  है शब्द
अर्थ
और करता है सार्थक/
हमारा मंत्रोच्चार हमें खुद गढ़ता है/
हम नहीं रचते मंत्रों को,
मंत्र हमें रचते है/


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Wednesday, 7 August 2013

कोटेश्वर

कोटेश्वर
यहीं है मेरा दशाश्वमेध,
यहीं है मेरा मणिकर्णिका,
यहीं पर आना है मुझे,
किन्हीं काँधों पर चढ़कर
कोटेश्वर
नर्मदा का तट
प्रातः नित्य
मत्स्याखेट को जाते केवट।
नन्हे बच्चे
नर्मदा के,
तैरने की कलाबाजी के साथ
ढूँढते हैं सिक्के नर्मदा में,
चुम्बक बाँधकर रस्सियों में
फेंकते है जल में
खोजने सिक्के नर्मदा से/
तैरती तरणियाँ पार उतारती है,
इस तरह नर्मदा
पीढ़ियों को तारती है,
उन्हें भी जो
जल में आनाभि
उतरकर देते हैं अर्ध्य तरणी को।
और उन्हे भी
जो घाट पर
चीथड़े फैलाकर
अन्न का दान
माँगते याचक।
त्रिकाल मज्जन कर
मुमुक्षु वितरागी
अपनी जटा जल में डुबोकर
फटकारता है
तो नर्मदा
कितने हीं
इंद्रधनुष रचती है
अपने अंक में।
संध्या के सिंदुरी सूर्य के
अस्ताचल में छिपने के बाद
नर्मदा परिक्रमा के
परिव्राजक
नन्हीं घंटियाँ टिनटिनाते हुए
नन्हे दीपों से
'जय जगदानंदी'
गाकर उतारते हैं आरती
सभी दु:ख
सारे क्लेश
नर्मदा हीं टारती।
इस तरह जीवन के कईं परसर्ग
रचती है नर्मदा—
नर्मदा ने,
नर्मदा को,
नर्मदा में,
नर्मदा से,
नर्मदा पर/
जीवन के उपरांतस्वर्ग के भी कई उपसर्ग लिखती है
नर्मदा,
अपने इसी तीर्थ
कोटेश्वर में,
कुमार स्कन्द की तपस्थली
कईं यज्ञों की पुण्यस्थली,
संस्कृति की स्रोतस्विनी की कोख से
जहाँ मानवता फूली और फली।
उरी और बाघनी नदियाँ
करती है संगम
करती है अभिषेक
नर्मदा का,
अपने शंख, सीपियों,और कंकड़ रेत से।
स्वीकारती है सर्व योगक्षेम
नर्मदा
जनम का, जीवन का, मरण का
करती है वरण
उनका भी
जो रण जीत जाते हैं,
और उनका भी
जो रण हार
खुद को न्यौछावर कर देते है।
मैं भी शब्दों को न्यौछावर करता हूँ
अभी
खुद के न्यौछावर होनें तक।
सर्वदा हर्म्यदा पुण्या सर्वत्र नर्मदा को।।
-—-—-—-—-—गजेंद्र पाटीदार 
23.07.2014

Friday, 21 June 2013

आतंकवाद

न जाने मरने के पहले के,
उस क्षण में, 
उसने क्या सोचा होगा।
शायद कोई दबी हुई इच्छा,
कोई प्यारा स्वप्न, 
उसकी आँखों के सामने तैर गया हो।
या शायद उसने सोचा हो अपने,
खेत खलिहानों के बारे में।
या शायद सोचा हो उसने,
अपने गाँव में कूकती कोयल को।
या शायद याद आई हो उसे,
अपने गाँव की स्वच्छ सुगन्धित शीतल वायु।
न जाने मरने से पहले के
उस क्षण में,
उसने क्या सोचा होगा?
शायद उसने सोचा हो अपने,
घर-परिवार के बारे में।
या शायद उसने सोचा हो अपने,
सबसे छोटे बच्चे का मासूम चेहरा।
या उसे याद आई होई शायद,
उसकी प्रतीक्षा करती मान की आँखें।
न जाने मरने से पहले के
उस क्षण में,
उसने क्या सोचा होगा?
न जाने मरने से पहले के,
वह धर्म, जाती जैसे शब्दों पर थूक सका,
या नहीं ।
न जाने वह द्वेष,इर्ष्य,स्वार्थ आदि शब्दों से,
नफ़रत कर सका, या नहीं।
न जाने मरने से पहले के
उस क्षण में,
उसने क्या सोचा होगा?
......साजिद आज़मी ex prof. Botny Govt.college Kukshi.

..............मै अपने मित्र साजिद आजमी (इलाहबाद) की कविता
(आतंकवाद) जो उन्होंने मुझे १९९४ में दी थी, शेयर कर रहा हूँ. और उन्हें ढूँढ़ रहा हूँ |

Sunday, 10 March 2013

पोखर का जल


पोखर का जल
शीतल, समतल,
उर्मियाँ निःशेष/
सामने वनराजि -
जिसे पोखर सींचता है/
खींचता है चित्र
अपने तरल दर्पण पर
और द्विगुणित कर देता है
हरीतिमा को /

Wednesday, 6 March 2013

ताल, तीर, बक और मछली

ताल के तीर पर
भ्रमित बक
समतल जल पर
निरख  कर प्रतिबिम्ब
अठखेलियाँ करता है,
खुद से / कभी
कभी
जल के भीतर
अठखेलियाँ करती मछली
को देखकर
फुदक कर मारता है चोंच
और खेलता है
मछली से,
इस तरह
ताल,
तीर,
बक
और मछली
माया का संसार रचते है/
भूख और भ्रम
सब जगह माया का संसार
रचते है…

Sunday, 16 December 2012

कल्पना


कल्पना के स्खलित होते शिखरों की                    
नग श्रंखला 
बिम्ब]
   शिल्पी की कुण्ठित छेनियाँ] 
प्रतीक]
   प्राचीन प्राचीरों के ढूह] खंडहर 
किस सौन्दर्य शास्त्र को गढ़ेगी कविता]
                         प्रास और अनुप्रास के 
                         अनुबंध को कर अस्वीकार 
रूपकों के तोड़कर विग्रह 
छंद को स्वच्छंदता की सान पर घिसकर 
व्याज और निर्व्याज 
    के सम्बन्ध को कर दर किनार 
              भावों की कविता चिड़ियाँ उड़ेगी। 


Wednesday, 5 December 2012

पाटीदारी बोली: अनुशीलन

            Gajendra Patidar         पाटीदारी बोली के सम्बन्ध में कुछ बातें आज अपने ब्लॉग पर शेयर करना चाहता हूँ। मूलतः पश्चिम निमाड़ के बड़वानी -  धार  की  तहसीलों  के 72 ग्रामो के  साथ  खरगोन जिले के 54 ग्रामों के लेवा पाटीदारों के द्वारा जिस बोली का व्यवहार अपनी मातृभाषा के रूप में किया जाता है ; उसका उल्लेख किसी भी प्रकार से म.प्र. के लिंग्विस्टिक शासकीय/अशासकीय कार्यों में नहीं है. हम पाटीदारों के मुख्य रूप से कृषिजीवी होने एवं अपने अंचल की प्रभुजाति होने के बावजूद ख़ुद हमारा ध्यान इस और नहीं गया है कि अत्याधुनिकता के इस दौर में अपनी  दिन-प्रतिदिन घुट घुट कर मरने वाली इस पाटीदारी बोली के बारे में, इसके परिमार्जन के बारे में सोचे.
                        हमारी यह बोली वस्तुतः गुजराती की बोलियों (एवं उपबोलियों) में (1.Ahmedabadi, 2.Gamada,  3.Anawla, 4. Bhawnagari, 5. Bombay Gujarati, 6. Brathela, 7. Charottari, 8. "PATIDARI", 9. Eastern Bhroch Gujarati, 10. Gohilwadi, 11. Gramya, 12. Holadi, 13. Jhalawadi, 14. Kakari, 15. Kathiyawadi,16. Kharwa, 17. Nagari, 18. Parsi, 19. Patani, 20. Patnuli, 21. Saurashtra Standard, 22. Sorathi, 23. Standard Gujarati, 24. Surati, 25. Tarimuki(Ghisadi).26. Vadodari, से एक "पाटीदारी" है। हिन्दी के भाषा विज्ञानी डॉ.भोला नाथ तिवारी ने अपने ग्रन्थ "हिंदी भाषा " में गुजराती भाषा की सोलह बोलियों और दो उपबोलियो को ही मान्यता दी है।
                        लेकिन मेरा आलोच्य विषय "पाटीदारी बोली" है। मेरा मत है  जब पाटीदारों ने अपनी मूल भूमि छोड़ कर मध्य भारत की ओर निष्क्रमण किया और निमाड़ के इस अंचल में आकर बसे, अपने साथ अपनी विरासत के रूप में अपनी मातृभाषा को लेकर आए। जिसका आज तक हम अपने भाषिक व्यवहार में उपयोग करते है। निश्चित ही पाटीदारी बोली का प्रभाव निमाड़ी बोली पर पड़ा है , और तदनुरूप निमाड़ी बोली का प्रभाव पाटीदारी बोली पर भी उसी रूप में पड़ा है।हमारी  इस भाषा को जीवित रहना चाहिए। क्योकि आज के तथाकथित युग में अब सभी समझदार लोग अपने बच्चों के  साथ अपनी बोली में नही बल्कि अंग्रेजी या हिंदी में बतियाना पसंद करते  है।
                         हमारी इस पाटीदारी बोली में लोक परंपरा और लोक गायन के साथ लोक साहित्य के पर्याप्त रूप विद्यमान है। लिखित साहित्य भी भजन-भक्ति व विविध संस्कारों के अवसर पर गाये जाते है।यथा ---------           
     सकळ  सभा ना मन भाया, रुण झुण  नाच रे गणराया।
     दोंद बड़ी दंतासुर मोटा,  दोंद बड़ी दंतासुर मोटा;
     लम्बी सोंड रोऴाया। रुण झुण  नाच रे गणराया।।
     शिवशंकर ना  पुत्र कहाया , शिवशंकर ना  पुत्र कहाया ,
     गंगा गौरा मायाँ ; रुण झुण  नाच रे गणराया।।                                             
                           उक्त उदाहरण के माध्यम से केवल यह सिद्ध है कि पाटीदारी बोली में प्राचीन रचित साहित्य पर्याप्त एवं सम्मान जनक मात्रा में विद्यमान है( यदि शोधार्थियों की अपेक्षा होगी तो ब्लॉग के माध्यम से उन्हें भी अनावृत करने की कोशिश करूंगा)। जैसा कि मैंने 72 व 54 ग्राम-गोल की बात की थी, वास्तव में कृषि एवं अन्य व्यावसायिक कारणों से इन ग्रामों के अतिरिक्त ग्रामों में भी लेवा पाटीदार समाज के बन्धु स्थानीय प्रव्रजन के तहत रहने व मान्यता प्राप्त कर 72 की जगह 77 ग्राम हो चुके है एवम् 54 की जगह भी अधिक हो गए है। जैसा की ज्ञात है -विश्व में प्रतिदिन भाषाऍ  मर रही है उसी श्रंखला में कहीं हमारी यह बोली भी श्रेणी -बद्ध न हो यह प्रयास हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। मै इस लेख के माध्यम से अपनी इस बोली के व्याकरणिक और साहित्यिक के साथ भाषा वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से भी विवेचन को सम्मिलित करने का प्रयास करूंगा।
                           मुझे तात्विक विवेचन से प्रतीत होता है की पाटीदारी बोली गुजराती भाषा की 'पाटीदारी' बोली के सबसे ज्यादा निकट है। चूंकि हमारे इन लेवा पाटीदारो का Great migration कही न कही चरोत्तर भूमि क्षेत्र से जुड़ा  है, जो माही और साबरमती के दोआबा प्रान्त के रूप में विख्यात है। इतने लम्बे समय में हम प्रव्रजित पाटीदारों की बोली पर निमाड़ी प्रभाव होना स्वाभाविक भी है और निमाड़ी को इस पाटीदारी बोली ने अपने शब्दकोष से संपृक्त  एवं समृद्ध भी किया है। समय के साथ अर्थ विस्तार, अर्थ संकोच, प्रयत्न लाघव, मुख-सुख आदि प्रवृत्तिया आती है  यह बोली भी उन प्रवृत्तियों से अभिन्न है।   इस बोली में लिखित साहित्य है, किन्तु अपर्याप्त है जिसके संकलन और गवेषणा दोनों  की  आवश्यकता है। और यह बोली भी अपने सुधीजनो से यही अपेक्षा करती है।
                             धार,  बड़वानी और खरगोन जिलों के कई ग्रामो में बोली जाने वाली यह बोली मध्य-प्रदेश के किसी भी शासकीय उल्लेख  में दर्ज नहीं है, क्योकि प्रायः  माध्यम के कॉलम में प्रत्येक पाटीदार हिंदी को ही अपनी भाषा के रूप में दर्ज करता है। यही अपनी इस भाषा के साथ अ'मान' की समस्या का मूल है।
                                        अब मैं हिंदी , गुजराती एवं पाटीदारी तीनो भाषाओ के वाक्यांशों का अनुवाद  प्रस्तुत करता हूँ ------
(हिंदी)  आप कहाँ गए थे ? (गुजराती)  તમે ક્યાં ગયા હતા? (पाटीदारी) तमी क्यां ग्याता?
(हिंदी) आप कब वापस आओगे? (गुजराती) તમે ક્યારે પાછા આવશો? (पाटीदारी) तमी क्यारS पछा आवोगS? आदि .........                                     क्रमश:.......

Monday, 3 December 2012

जन्मांध

कुछ लोग  
जन्मांध है/
न देखने 
कसम खाने  का 
                  प्रश्न ही कहाँ उठता है/
परन्तु
स्वप्न देखने की मनाही  
कभी 
किसी काल,  
युग 
और देश में 
कभी नहीं रही 
इसलिये 
देख रहे है 
निर्बाध....स्वप्न....दिवा स्वप्न.... 30/10/1999   ---------xtsUnz ikVhnkj



         || फिरा दो मुनादी ||

फिरा दो मुनादी 
                 कि स्वप्न 
मैंने देखे है
                  राम राज्य के 
                          इस रौरवी धरा पर 
अभिव्यक्ति स्वातन्त्र्य पर 
                                      कुछ गूंगे मुखर है 
न्याय की देवी की आँखों पर बंधी पट्टी 
                                कानो को भी कसे हुए है। ---------xtsUnz ikVhnkj

Sunday, 2 December 2012

लाक्षागृह

अपने अपने लाक्षागृह/
हर किसी को दहना पड़ता है/
हर किसी को निकलना पड़ता है/
पतली सुरंग से/
दूर जंगल तक चली जाती है वह/
मनुष्य को सुरक्षित छोड़ने के लिये/
जब गृह लाक्षागृह बन जाय/
तब भरोसा किया जा सकता है/
एक अदद अँधेरी गह्वर गुफा,
कुहेलिका के व्यूह सी सुरंग पर/
सुरंगे बिल और बाँबियाँ/
विचार को जन्म देती है/
सदैव सुरक्षा को मुहैया कराती है/
इस तरह मानवता के पक्ष में जाती है सुरंगे/
लेकिन लाक्षागृह भी तपाता और निखारता है युधिष्ठिर को/
उसके शूल और शील दोनों को धार देता है/
लाक्षागृह कभी भी दुर्योधन को सुयोधन नहीं बनाता/
लेकिन युधिष्ठिर को युधिष्ठिर के रूप में स्थापित करता है/
वारणावृत्त और विदुर दोनों जीवन की कितनी ही पहेलियाँ बुनते है/-------गजेन्द्र पाटीदार 18-04-2011







Wednesday, 28 November 2012

माहौर नर-संहार का विषन्य ( 17 अप्रेल )


सम्वेदना मर रही है
सम्वेदना अमर है,
मर इसलिये रही है  -कि
मरना उसकी नियति है/
सतत् मर रही है
इसलिये अमर है/
                  कल हीं तो
                  मरी थीं दबकर कुचलकर
                  या कहीं हुई थीं-
                  गोली की शिकार/
हर बार
मरकर पुनः जी उठती थीं
कदाचित ...
जीना भी उसकी नियति है.
किन्तु आज
वह फिर मरी है
अपने ही घर में विस्थापित होकर
यही है-
           अखबार की ख़ास खबर
               इसलिये मरी है/
               हमारे भीतर
कि-
हर सुबह अखबार पढ़ना
उस पर बहस करना
फिर बहस कर भूल जाना
यही आदमीयत की
                            इति श्री है/
इसीलिये घुट-घुट कर
जीती है/
                  और मरती भी है इसीलिये
कि- अब ये सब
आम बात है/
स्थिति तनाव पूर्ण नियंत्रण में,
यही हालत है/
कुछ भी करने पर दंड
यही व्यवस्था की बिसात है/
आज मरना
                सम्वेदना का
और कल फिर मरना उसकी जिजीविषा है,
सबमें
मरकर
पुनः जीती है/
              यही उसकी विजीगिषा  है/
इस तरह
आज जब
सब जगह्
मरी है तो
उसका उठावना,
कल
कब /कहाँ होगा
पता नहीं।।।।-------गजेन्द्र पाटीदार 

Monday, 26 November 2012

विडंबना


मैंने लिखा/
             मचा दी क्रांति
विचारों की,
गाड़े कीर्ति के झन्डे/
लोग उठ खडे हुए
            विप्लव के स्वर में
लेकर हाथों में झन्डे/
मैंने लिखी थीं भूख,
            लिखी थीं नग्नता,
            जिसने दी रोटी, दिए कपड़े/
जब मैंने ख़ुद को लिखा---
वह
      अब मै नहीं रहा/
अब मै पाता हूँ,
अपने आप को
उन भूखे, नंगो से जुदा
और फिर अब मै
कब से कोशिश कर रहा हूँ
                          लिखने की
मकान/
कि मुझे छत भी मिल जाएँ/
किन्तु कइयों के छप्पर
                            छिन जाने का डर है/-------गजेन्द्र पाटीदार



Sunday, 25 November 2012

मंथन

शब्द तुम,
                अर्थहीन भटकते
पृथ्वि पर
आक्रांत कर रहे हो,
मानव को
              मानस को
दानव बहरा है
क्यो जगाते हो उसे?
जब मानव की सम्वेदना,
मर चुकी,
तब क्यो बकवाद की चिता
को लगाते हो?
        शब्द तुम शांत हो जाओ
कि क्रांति तुम्हारे साथ
प्रेयसी नहीं लगती
       तुम्हारा ताण्डव का आवाहन
                                        थोथा है/
क्योकि शंकर
समाधिस्थ नहीं
संहार की थकावट में
                                श्रांत
                                        सोता है/
शब्द तुम
शक्तियों को
              चेतना की त्वरा दो,
अभिधा से, लक्षणा से,
 व्यंजना से,
                प्रखरतर जाग्रत करो,
तुम्हारे मंथन से
हलाहल निकला है,
तो अमृत की प्रतीक्षा
का धीरज बाँधों/
                  पर सावधान!!
                   कोई राहु अब छले ना/ -------------गजेन्द्र पाटीदार 

अनुमान

मैंने समुद्र देखा नहीं कभी,
मैं एक घोंघा,
एक मछली,
एक मुठ्ठी रेत,
और एक चुल्लू पानी
देखकर।
उसका अनुमान करता हूँ।
और भूल जाता हूँ
खारे पान को।
जो समंदर को
इन सबसे अलग बनाते है।
पर मै अब समझने लगा हूँ--
कि वह खारेपन के बावजूद-
कोई बड़ी चीज है।
और जिसे खारे पानी से
भरी आँखें भी-
नहीं देख सकती।  -------गजेन्द्र पाटीदार 

Monday, 5 November 2012

गुमशुदा


गुमशुदा
अपने जीवन से
अपरिचित उस आदमी ने
आज देखा इश्तहार
अपने गुम होने का
ठिठक गया वह
देखकर अपनी
उन इश्तहारों में गुमशुदगी
पर आज उसे कितना
सुकून मिला?
बस भगवान जानता है।
जो अनाम जिंदगी में नहीं मिला
उसे वह इन इश्तहारों में पाकर
वह खुश है
खुश है खुद के
खोने का
कितना उल्लास आज
उसे मिल रहा
जो जीकर नहीं पाया
वह खोकर पाया
इन इश्तहारों में
'कि कोई उसे भी ढूँढता तो है'
-कितना है गुमशुदगी का सुकून?
बिसराया वर्तमान जानता है।
कोई और
समझे न समझे!!