वे शब्द
मखमली....!
मैं छूता था जब
उन्हें,
लगते थे निहायत खूबसूरत
अनंत संभावनओं की तरह उन्नत,
पर अब वे लगते है,
मिट्टी की तरह।
उर्वर नहीं;
बारूदी!!
ऊसर मस्तिष्क की
गहरी सुरंगों में ठ्से
चिंगारी की तलाश में...!
वे शब्द
जैसे एक जिंदा लाश,
अर्थहीन;
कि उठती नहीं—
जिसमें सड़ाँध
फिर भी करते हैं दूषित
मन को,
मानस को,
मानुस को,
वे शब्द
अखबारी शब्द ......
मन के भाव शब्दों में ढलकर जब काव्य रूप में परिणित होकर लेखन की भूमि पर बोये जाते है, तो अंकुरित हरितिमा सबको मुकुलित करती है! स्वागत है आपका इस काव्य भूमि पर.....।
Wednesday, 7 December 2011
मीडिया शगल
Tuesday, 6 December 2011
प्रतिकार
सैनिकों की हत्या का
षड़यंत्र शामिल/
प्रतिकार का सूचकांक
शेयरों के भाव गड़बड़ाता है/
मृत्यु के बाद अवदान पर छिड़ी बहसे/
किम्कर्तव्यविमूढ़ सी सैनिकों की
बंदूक और फड़कती नसें/
वैश्वीकरण के प्रशस्त पथ में
सुरक्षा अवरोध/17-02-2002-------गजेन्द्र पाटीदार
मैं हूँ (- गजेन्द्र पाटीदार)
जीवन का हस्ताक्षर हूँ/
श्लथ हूँ, चुका हूँ,
क्षत और विक्षत हूँ/
अपने होने की सभी सम्भावनाओ के साथ
अपने अदम्य साहस
और निष्ठा के साथ
प्रतिष्ठित भी हूँ/
अपने अनिमेष नेत्रों से नवोन्मेष का स्वप्न दृष्टा भी हूँ/
अपने करों से
सर्जना के बिंब गढ़ता,
वर्जना की सीढ़िया चढ़ता सृष्टा भी हूँ/ 05-12-2011
Sunday, 4 December 2011
फितरत
सूअर की माँ
जानती है,
संसार का तमाम
मैला और जूठन
खाने के बाद भी मनुष्य
अपनी
समूची अनिच्छा और अरूचियुक्त
क्षुधा के बाद भी
उसके बेटे को खाना नहीं छोड़ेगा/
चाहे उसके बेटे की
रग रग में
भरा हो संसार भर का
विष्ठा, अपच और अपशिष्ठ
पर गंदगी में भी
रूचि के अवसर
ढूँढ कर
पचा जाना
मनुष्य की
फितरत हो गई है/
कुछ भी खा जाना
उसकी नीयत हो गई है/
इसलिये सूअर की माँ
विचार कर रही है
कि
वह आगे से
उसी संसार का
सारा उच्छिष्ट
खुद इन्सान के लिये
छोड़ दे
शायद संसार का
उससे पेट भर जाय?
. ...... 24-08-14
Thursday, 1 December 2011
बहती नदी—गजेंद्र पाटीदार
मुझ मेँ नदी बह़ती है
लगभग समूची
तट पर खड़े लोग
देख सकते है
मंथर, मदिर ,उर्मियाँ
सपाट समतल जल पर
पर गहरे मेँ
एक अंत:सलिला भी
बहती है निरंतर
वही उस नदी का उत्स है,
वही अंत: सलिला हीं
जिलाती है
मुझको सबमें
सबको मुझमेँ।
अनवरत बहकर यह नदी
मुझमेँ मुझको
जिंदा रखती है ।
जो गहरे डूबकर
कुछ खोजते है ।
पा हीं जाते है,
समूची नदी
क्यों कहूँ मोती,
घोंघे,सीपियाँ, शंख,
मछली
ये भी तो नदी के हीं अवयव हैं।
मैं नदी को
भिन्न नहीँ देखता ।
अभिन्न है,
समूची नदी । ....14,08,2014
Friday, 18 November 2011
हे ईश्वर ..तू है।
मैं नहीँ जानता
वेद, उपनिषद
और तेरे रचाए
दर्शन,
मैं क्यों अपनी
छोटी बुद्धि में
इन सबको झेलूं
कि ये सब
मनुष्य को
किंकर्तव्यविमूढ़ता में
धकेलने के
तेरे हीं औजार हैं/
तुझ पर अनास्था का भी
प्रश्न नहीं
क्योंकि
इस विषमता भरी
सृष्टि का तू हीं
जिम्मेदार है/
तू खुद को अभिव्यक्त
करने के चक्कर में
बना बैठा
यह विषमता भरी सृष्टि /
यह तेरा अपराध है/
मैं नहीं करूँगा
तेरा यशगान
न गाऊंगा
तेरी बिरूदावलियाँ
क्योंकि लगता है
तू इन्हीं का भूखा है/
तूने व्यक्त होकर
रचा संसार
विषमताओं के विष से
भरा/
तो मैं भी सिरजूंगा
वैसी हीं
हलाहल भरी कविताएँ
विषमताओं के विषदंश देती /
जो तुझे चुभे
वेदना दे तुझे
जैसी पीड़ा से मैं गुजरा
उसका कुछ अंश
हीं सहीं
तू भी झेले
केवल नास्तिक होकर
तुझे नकारना/
—मैं मानता हूं
होगा पलायन
इसलिये तुझे स्वीकरता हूं
नकारने के लिये/
—मैं मानता हूं
तू है/