सैनिकों की हत्या का
षड़यंत्र शामिल/
प्रतिकार का सूचकांक
शेयरों के भाव गड़बड़ाता है/
मृत्यु के बाद अवदान पर छिड़ी बहसे/
किम्कर्तव्यविमूढ़ सी सैनिकों की
बंदूक और फड़कती नसें/
वैश्वीकरण के प्रशस्त पथ में
सुरक्षा अवरोध/17-02-2002-------गजेन्द्र पाटीदार
मन के भाव शब्दों में ढलकर जब काव्य रूप में परिणित होकर लेखन की भूमि पर बोये जाते है, तो अंकुरित हरितिमा सबको मुकुलित करती है! स्वागत है आपका इस काव्य भूमि पर.....।
सूअर की माँ
जानती है,
संसार का तमाम
मैला और जूठन
खाने के बाद भी मनुष्य
अपनी
समूची अनिच्छा और अरूचियुक्त
क्षुधा के बाद भी
उसके बेटे को खाना नहीं छोड़ेगा/
चाहे उसके बेटे की
रग रग में
भरा हो संसार भर का
विष्ठा, अपच और अपशिष्ठ
पर गंदगी में भी
रूचि के अवसर
ढूँढ कर
पचा जाना
मनुष्य की
फितरत हो गई है/
कुछ भी खा जाना
उसकी नीयत हो गई है/
इसलिये सूअर की माँ
विचार कर रही है
कि
वह आगे से
उसी संसार का
सारा उच्छिष्ट
खुद इन्सान के लिये
छोड़ दे
शायद संसार का
उससे पेट भर जाय?
. ...... 24-08-14
मुझ मेँ नदी बह़ती है
लगभग समूची
तट पर खड़े लोग
देख सकते है
मंथर, मदिर ,उर्मियाँ
सपाट समतल जल पर
पर गहरे मेँ
एक अंत:सलिला भी
बहती है निरंतर
वही उस नदी का उत्स है,
वही अंत: सलिला हीं
जिलाती है
मुझको सबमें
सबको मुझमेँ।
अनवरत बहकर यह नदी
मुझमेँ मुझको
जिंदा रखती है ।
जो गहरे डूबकर
कुछ खोजते है ।
पा हीं जाते है,
समूची नदी
क्यों कहूँ मोती,
घोंघे,सीपियाँ, शंख,
मछली
ये भी तो नदी के हीं अवयव हैं।
मैं नदी को
भिन्न नहीँ देखता ।
अभिन्न है,
समूची नदी । ....14,08,2014